Monday, June 21, 2010

विचार कि लहरे

एक प्रयोग कर के देखें, पांच मिनट के लिये आंखे बंद कर ले और भितर देखें|
तुम देखोगे विचार चल रहे है भितर|
तो देखते रहे विचारों को जैसे नदि किनारे बैठे हो और प्रवाह को देख रहे हो|
कुछ देर तक विचारप्रवाह को देखने के बाद एक सवाल पुछे अपने से और बिलकुल होशपुर्वक देखें कया होता है|
और वो सवाल है - "मेरा अगला विचार कहा से आयेगा?"
ये सवाल पुछे और होशपुर्वक देखे जैसे बिल्ली चुहे के बिल को ताकती है के कब चुहा बाहर आये| सवाल पुछते हि तुम अगर होश से भर गये और देखने लगे अगला विचार कहा से आयेगा तो तुम पाओगे विचार रुक गये| अब वहा सिर्फ होश है, कुछ क्षण के लिये बिलकुल सन्नाटा हो जायेगा, एक अंतराल आयेगा|
वह अंतराल, वह शुन्य, वह सन्नाटा जिसका अभी अभी तुमने अनुभव किया वह तुम हो|
और वह शुन्य खाली नही है, बल्कि भरा हुवा है, होश से|
अब तुम जान जाओगे बरसो नही लगते मौन होने के लिये|
फिर आंख बंद कर ले, विचारों को फिर चलने दे , कुछ देर देखते रहे और पुछे - "ये विचार कहां खो रहे है?".
देखते रहे मन के पर्दे पर जो चित्र उभर रहे है वो कहां खोते है?
तुम पाओगे शुन्य से विचार कि लहरे उठ रही है और शुन्य मे ही विलिन हो रही है| जिस आकाश मे जिस शुन्य मे विचार कि लहरे उठ रही है और मिट रही है वो आकाश, वह शुन्य तुम हो|
जब भी समय मिले आंख बन्द कर ले और देखे विचार कहा से आते है और कहा जाते है, तुम पाओगे मन सहज शांत होने लगा, शरीर शिथिल होने लगा|  
अपने से मिलना हो जाए तो सब दुख मिट जाते है|
स्वयं से मिलन हि सच्चा मिलन है|
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Saturday, June 19, 2010

साधना

निंद मे जि रहे हो तो होश को साधना है|
होश मे आने के लिये कुछ करना नही है, बस होशपुर्वक होना है|
होशपुर्वक होने के लिये न तो जंगल मे जाना है और ना हि तिर्थक्षेत्रों कि परीक्रमा करना है|
जहा भी हो, जैसे भी हो जाग जाए|
शुरु मे थोडा कठीन मालुम होगा, और कठीन तो है भी क्योंकी बरसो का अभ्यास है और निंद गहरी है| आसान परीस्थीतियों मे होश सध जायेगा तो वहा से शुरु करे|
राह से गुजरे तो होश को संभालकर चलें, पता चलेगा सारा शहर सोया हुवा है|
कठीन परीस्थीतियों मे होश को संभालना मुश्किल होगा तो निराश होने कि जरुरत नही है|
बरसो भी लग सकते है तो इसे खेल समझके खेलने की तैयारी रखना जरुरी है|
गहरे पीडा मे, भय मे, क्रोध मे होशपुर्वक होना आसान नही है, लेकिन असंभव भी नही है|
सौ बार चुक सकते हो फिर भी एक दिन संभव हो जाएगा|
कोई दुसरा तुम्हे मदत नही कर सकता|
जब भी कोई पीडा हो, भय या संताप पकड ले तो जाने यह जागने का समय है|
किसी भी तरह का मानसिक असंतुलन बेहोषी का संदेश है|
उसका उपयोग कर लेना और जाग जाना ही एकमात्र साधना है|
जिवन मे अनंत अवसर है होश को खोने के, उन क्षणो मे होश को संभालना ध्यान है|
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Friday, June 18, 2010

मै हुं

सारी दुनिया घुम आये लेकिन ये नही जाना के वह कौन है जो चल रहा था,
सारी दुनिया देख ली मगर भीतर झांकना नही हुवा,
मीत्र, प्रियजन, प्रेमी, परीवार इत्यादी से मिलना हुवा लेकिन स्वयं से मिलना नही हुवा|
बाहर संपत्ती के ढेर लगा दिये मगर खुद को हि खो दिया,
चांद तारों की खोज कि मगर खुद कि खोज न हो सकी,
दोस्ती और दुष्मनी के खेल खेले, मजा आ गया,
नुकसान सिर्फ इतना हि हुवा के मै कौन था, कहा से आया, क्युं आया इसका पता हि नहि चला|
मौत ने जब द्वार पर दस्तक दी, तब पहली बार ये खयाल आया, अरे मै जिंदा भी था|
मौत का खयाल रहे, और "मै हुं" इसका बोध रहे, चौबीस घंटे बस इतनी हि बात है,
यही तो ध्यान है|
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Monday, June 14, 2010

दुःख का कारण

वर्तमान मे जिने कि कला है ध्यान|
क़ुछ कठिन नहि है, ना हि कुछ रहस्य है|
व्यक्ती जी रहा है अतित मे या तो भविष्य मे|
यहि उसके दुःख का कारण है|
दुःख का अर्थ केवल इतनाहि है, पुराने घाव कुरेदना, या भविष्य कि चिंता करना और कुछ् कारण नहि है दुःख का|
जितने क्षण होश मे जिओगे दुःख से मुक्त रहोगे|
और केवल दुःख से हि नहि बल्कि समस्त मानसिक बिमारियोंसे भी दुर रहोगे|
सारे शास्त्रों का निचोड केवल इतना हि है, के होश से जिये|
जहा भी हो, जैसे भी हो बस होश मे आ जाओ|
अगला जनम पिछला जनम इसकि फिक्र ना करो|
कुंडलिनि चक्र इत्यादि बातो मे मत उलझना|
कौन जागा हुवा है और कौन सोया इसकि चर्चा व्यर्थ है|
अपनी फिक्र कर लो तो बहोत हो गया|
गुरु, शास्त्र और शिविरो मे समय व्यर्थ मत गवाना, बस अभी और यहि जाग कर जिना|
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Monday, January 18, 2010

खालीपन

किसीने मुझसे पुछा, "मेरे पास सब कुछ है, बंगला है, कार है, बीबी है, बच्चे है, पैसा है, पद और प्रतिष्ठा भी है फिर भी कुछ खाली सा लगता है, क्या वजह हो सकती है?"

मैने कहा, "सब कुछ पाने के लिये खुद को हि खो दिया तो क्या पाया?"

"और सब कुछ पाकर साथ लेकर भी क्या जाओगे?"

"और अगर खुद को हि पा लिया तो पाने के लिये और बचता भी क्या है?"
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Sunday, January 17, 2010

ध्यान क्या है?

ध्यान क्या है?
ध्यान कुछ ऐसा नहीं के  किसी के चरणों में  जा गिरे और समर्पित हो गए| ध्यान का मतलब है होश में जीना| देखना अपने मन के गतिविधियोंको| भय, क्रोध, इर्षा और इतर सभी मनोआवेगोंको देखना ही ध्यान है| यह ध्यान कभी भी और कही भी हो सकता है| ध्यान के लिए किसी खास जगह या शांति की जरुरत नहीं है|  ध्यान  के लिए किसी गुरु या किसी विधि की भी जरुरत नहीं है| ध्यान को किसी भी क्रिया के साथ आप जोड़ सकते है|
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