तुम देखोगे विचार चल रहे है भितर|
तो देखते रहे विचारों को जैसे नदि किनारे बैठे हो और प्रवाह को देख रहे हो|
कुछ देर तक विचारप्रवाह को देखने के बाद एक सवाल पुछे अपने से और बिलकुल होशपुर्वक देखें कया होता है|
और वो सवाल है - "मेरा अगला विचार कहा से आयेगा?"
ये सवाल पुछे और होशपुर्वक देखे जैसे बिल्ली चुहे के बिल को ताकती है के कब चुहा बाहर आये| सवाल पुछते हि तुम अगर होश से भर गये और देखने लगे अगला विचार कहा से आयेगा तो तुम पाओगे विचार रुक गये| अब वहा सिर्फ होश है, कुछ क्षण के लिये बिलकुल सन्नाटा हो जायेगा, एक अंतराल आयेगा|
वह अंतराल, वह शुन्य, वह सन्नाटा जिसका अभी अभी तुमने अनुभव किया वह तुम हो|
और वह शुन्य खाली नही है, बल्कि भरा हुवा है, होश से|
अब तुम जान जाओगे बरसो नही लगते मौन होने के लिये|
फिर आंख बंद कर ले, विचारों को फिर चलने दे , कुछ देर देखते रहे और पुछे - "ये विचार कहां खो रहे है?".
देखते रहे मन के पर्दे पर जो चित्र उभर रहे है वो कहां खोते है?
तुम पाओगे शुन्य से विचार कि लहरे उठ रही है और शुन्य मे ही विलिन हो रही है| जिस आकाश मे जिस शुन्य मे विचार कि लहरे उठ रही है और मिट रही है वो आकाश, वह शुन्य तुम हो|
जब भी समय मिले आंख बन्द कर ले और देखे विचार कहा से आते है और कहा जाते है, तुम पाओगे मन सहज शांत होने लगा, शरीर शिथिल होने लगा|
अपने से मिलना हो जाए तो सब दुख मिट जाते है|
स्वयं से मिलन हि सच्चा मिलन है|