सारी दुनिया देख ली मगर भीतर झांकना नही हुवा,
मीत्र, प्रियजन, प्रेमी, परीवार इत्यादी से मिलना हुवा लेकिन स्वयं से मिलना नही हुवा|
बाहर संपत्ती के ढेर लगा दिये मगर खुद को हि खो दिया,
चांद तारों की खोज कि मगर खुद कि खोज न हो सकी,
दोस्ती और दुष्मनी के खेल खेले, मजा आ गया,
नुकसान सिर्फ इतना हि हुवा के मै कौन था, कहा से आया, क्युं आया इसका पता हि नहि चला|
मौत ने जब द्वार पर दस्तक दी, तब पहली बार ये खयाल आया, अरे मै जिंदा भी था|
मौत का खयाल रहे, और "मै हुं" इसका बोध रहे, चौबीस घंटे बस इतनी हि बात है,
यही तो ध्यान है|
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