Saturday, June 19, 2010

साधना

निंद मे जि रहे हो तो होश को साधना है|
होश मे आने के लिये कुछ करना नही है, बस होशपुर्वक होना है|
होशपुर्वक होने के लिये न तो जंगल मे जाना है और ना हि तिर्थक्षेत्रों कि परीक्रमा करना है|
जहा भी हो, जैसे भी हो जाग जाए|
शुरु मे थोडा कठीन मालुम होगा, और कठीन तो है भी क्योंकी बरसो का अभ्यास है और निंद गहरी है| आसान परीस्थीतियों मे होश सध जायेगा तो वहा से शुरु करे|
राह से गुजरे तो होश को संभालकर चलें, पता चलेगा सारा शहर सोया हुवा है|
कठीन परीस्थीतियों मे होश को संभालना मुश्किल होगा तो निराश होने कि जरुरत नही है|
बरसो भी लग सकते है तो इसे खेल समझके खेलने की तैयारी रखना जरुरी है|
गहरे पीडा मे, भय मे, क्रोध मे होशपुर्वक होना आसान नही है, लेकिन असंभव भी नही है|
सौ बार चुक सकते हो फिर भी एक दिन संभव हो जाएगा|
कोई दुसरा तुम्हे मदत नही कर सकता|
जब भी कोई पीडा हो, भय या संताप पकड ले तो जाने यह जागने का समय है|
किसी भी तरह का मानसिक असंतुलन बेहोषी का संदेश है|
उसका उपयोग कर लेना और जाग जाना ही एकमात्र साधना है|
जिवन मे अनंत अवसर है होश को खोने के, उन क्षणो मे होश को संभालना ध्यान है|
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